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बिना मानक के दौड रहे हैं विद्यालय वाहन, नौनिहालों की जान खतरे मे | फतेहपुर


Friday, March 17 2017
आशीष ओमर, रिपोर्टर फतेहपुर

फतेहपुर, तहसील बिन्दकी(यू. पी.) 


बिद्यायलयो के वाहनो मे
नियमो का नही होता पालन

बिना मानक दौड रहे
बिद्यायलयो के वाहन
तहसील क्षेत्र मे कुकरमुत्तो की तरह खुले निजी बिद्यायलयो मे वाहनो पर कोई भी नियम व कानून नही लागू हो पा रहा है बिद्यायलयो के वाहनो मे क्षमता व सीटो से अधिक बच्चे ढूस ढूस कर भरे जाते है वही पर शहरो व कस्बो मे जो रिक्शे बच्चो को लाने लेजाने के लिये लगाये गये है वह रिक्से वाले भी पॉच की जगह दस दस बच्चे भर कर ले जारहे है जिन बच्चो को अभिवावक बडे प्यार से तैयार कर सुबह हाथ हिला कर बिदा तर ते है वह भी नही देखते की इतनी महगी वाहन फीस व बिद्यायलयो की फीस देने बाद भी उनका बच्चा सही सलामत पूरी सुरक्षा के साथ बिद्यालय जा रहा है कि नही ज्यादह तर लगे निजी वाहनो मे वाहन स्वामी ज्यादह बचाने के चक्कर मे पेट्रोल वाहन को गैस किट लगवा कर गैस से चलाते है और कई वाहन स्वामी तो घरेलू गैस स् वाहनो को चला रहे है जिससे हमेशा बाहन मे आग लगने का खतरा बना रहता है और बच्चो की जिन्दगी दॉव पर लगी रहती है जिस पर नाही बिद्यालय प्रबन्धन कोई आपत्ती करता है और ना ही अभिवावको को इन नौनिहालो के उपर आने वाले खतरे का एहसास है वह तो बच्चो को अच्छे बिद्यालय मे प्रवेश दिला कर पूरा ध्यान बच्चे पढाई मे लगाने की बात कर के अपनी जिम्मेदारी बिद्यालय प्रबन्धन के ऊपर छोड देते है और बिद्यालय प्रबन्धन ज्यादह बचाने के चक्कर मे कही टैम्पो तो कही रिक्शा कही बिक्रम आदि मे बिना सुरक्षा के बच्चो को लाने और ले जाने का इन्तजाम करते है वह भी वाहन बगैर पीले रंग के और बिना बिद्यालय के बाहन या बच्चे है की पट्टिका तक नही लगाते है जब की नियम यह है कि जो भी वाहन बिद्यालय प्रबन्धन द्वारा अनुबन्धित किया जाय उसका रंग पीला होना चाहिये एवम उस पर बिद्यालय का कलर कोड होना चाहिये व स्कूली बच्चे है की पट्टिका लगी होनी चाहिये पर बिद्यालय प्रबन्धन की व प्रशाशनिक व अधिकारियो की ला परवाही के चलते सैकडो बिद्यालय वाहन गैस से चलाये जा रहे है और बेरोक टोक बच्चो को लेकर सडको मे दौड रहे है जिस पर कभी भी आज तक अभिवावको द्वारा भी कोई बिरोध नही किया जाता है और जिम्मेदार अधिकारियो की कुम्भ करणी नीद शायद किसी बडे हादसे के बाद ही टूटती है ग्रामीणान्चलो मे हाल यह है की एक ही बाहन मे बच्चे ॉभेड बकरीयो की तरह ढूस कर भरे जाते है वह भी वाहन चालक लापरवाही से वाहन को तेज रफ्तार से भगाते है जब की नियमतह बिद्यालयो के वाहन की रफ्तार की भी सीमा तय की गयी है वही पर बिद्यालयो के वाहनो पर कही भी मानको को पूरा नही किया जारहा है और बिभागीय अधिकारी भी अपने हिस्से की रकम लेकर इस तरह के वाहनो को चलने व चलाने की मूक सहमती प्रदान किये रहते है जब की सरकार ने बिद्यालयो मे लगे वाहनो के लिये नियम बनाये है वह नियम बलाये ताक कर के बिद्यालय प्रबन्धन द्वारा कफी पुरानी व खटारा वाहनो को लगाया जाता है
जब कि नियम है कि निजी बाहनो पर बिद्यालय का कलर रोड होना चाहिये
प्रत्येक तीन महीने मे प्रिन्सिपल द्वारा बसो की समीक्षा की जानी चाहिये
ड्राईवर व कनडेक्टर की योग्यता व मान्यता पर बिचार होना चाहिये
बिद्यालय वाहन का फिटनेश सार्टिफिकेट व डराईवर का लाइसेन्स होना चाहिये
खिडकियो मे जाली व तीन राड ते साथ चढने व उतरने की ब्यवस्था होनी चाहिये

बिद्यालय वाहन का रंग पीला व बिद्यालय वाहन लिखा होना चाहिये
बिद्यालय वाहन मे साइड मिरर व इन्डिकेटर लाईट दुरस्त होनी चाहिये
बैठने की सीटे सही व खिडकी से इतनी नीची हो कि बच्चे सर बाहर न निकाल सके
बिद्यालय वाहन की गती सीमा भी निर्धारित होनी आवश्यक है
बिद्यालय वाहन मे प्राथमिक उपचार की ब्यवस्था होनी चाहिये
बिद्यालय वाहन का फिटनेश सार्टिफिकेट छै माह से पुराना नही होना चाहिये
पन्द्रह साल से पुराना वाहन बिद्यालय मे बच्चे लाने या ले जाने के लिये प्रयोग मे नही लया जा सकता
वाहन के आगे व पीछे स्पष्ट रूप से बिद्यालय वाहन लिखा होना चाहिये
यह सभी नियम शायद ही किसी बिद्यालय के वाहन पर प्रयोग किये जाते हो यहॉ पर बिद्यालय प्रबन्धन द्वारा धन बचाने के चक्कर मे नियमो की अनदेखी कर के हजारे ब्चो के जीवन के साथ खिलवाड किया जाता है और यह स्थिति शायद ग्रामीण क्षेत्रो की नही बल्कि शहरो व कस्बो की भी है जहॉ पर इन वाहनो पर हमेॉशा ही जिम्मेदार अधिकारियो की नजरे पडती रहती है लेकिन ऊची पहुच व पैसे के दम पर इस तरह से मानको की अनदेखी कर के यह वाहन बिद्यालय प्रबन्धन के द्वारा चलवाये जाते है और जिम्मेदार लोगो भी शायद किसी बडे हादसे का इन्तजार है तब शायद इनकी तन्द्रा टूटेगी

 

संवाददाता आशीष ओमर 

 

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