ऑक्सीजन हटाने से टूटी ललितपुर और उन्नाव के मरीजों की जीवन डोर | लखनऊ

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ऑक्सीजन हटाने से टूटी ललितपुर और उन्नाव के मरीजों की जीवन डोर | लखनऊ


Monday, July 17 2017
Vikram Singh Yadav, Chief Editor ALL INDIA

ऑक्सीजन हटाने से टूटी ललितपुर और उन्नाव के मरीजों की जीवन डोर

ललितपुर जिला के गुड़ा गांव निवासी सुखदीन बीस दिन के बेटे का बड़ी उम्मीद के साथ केजीएमयू के ट्रॉमा सेंटर में इलाज कराने लखनऊ आए थे। इसके लिए उन्होंने 70 हजार रुपये उधार लिए थे। रविवार रात ट्रॉमा में अग्निकांड के दौरान ऑक्सीजन सिलेंडर हटाने से उनके बेटे की मौत हो गई, जिसके साथ उनकी सारी उम्मीदें आग में जल गईं। सुखदीन ने साथ मौजूद लेखपाल से उधार लिया, तब बेटे के शव का अंतिम संस्कार कराया। उन्नाव निवासी किसान देवीप्रसाद (55) के चचेरे भाई के मुताबिक उनकी मौत भी अग्निकांड के दौरान ऑक्सीजन सिलेंडर हटाने से हुई।

सुखदीन ने बताया कि वह 26 जून को झांसी अस्पताल में जन्मे बेटे का इलाज कराने 29 मई को राममनोहर लोहिया अस्पताल लाए थे। बच्चे के सांस नली में दिक्कत थी। पांच मई को लोहिया के डॉक्टरों ने उसे ट्रॉमा सेंटर रेफर कर दिया। यहां चौथे तल पर चार नंबर वार्ड में मासूम भर्ती था। बच्चे की हालत में सुधार भी हो रहा था। शनिवार शाम करीब सात बजे तक बच्चा जीवित था। करीब सवा सात बजे आग जब तीसरी मंजिल पर पहुंची तो सुखदीन ने पत्नी लक्ष्मी को सुरक्षित नीचे पहुंचाकर डॉक्टरों से बेटे को ले जाने की जिद की। आरोप है कि डॉक्टरों ने बच्चे का ऑक्सीजन सिलेंडर हटाने के साथ उसे लाइफ सपोर्ट सिस्टम से भी हटा दिया। इसके बाद ट्रॉमा प्रशासन ने मासूम को बाल रोग विभाग शिफ्ट कर दिया, जिससे उसकी मौत हो गई। रात दस बजे के करीब जब सुखदीन बच्चे को खोजते वहां पहुंचे तो उसकी मौत हो चुकी थी। 

उन्नाव के रसूला हसीबन गांव निवासी देवीप्रसाद (55) के चचेरे भाई सचिन शुक्ला का कहना है कि वह सड़क हादसे में घायल हो गए थे। रविवार दोपहर उन्हें ट्रॉमा सेंटर के तृतीय तल पर स्थित न्यू सर्जरी वार्ड में भर्ती कराया था। आरोप है कि देर शाम जब ट्रॉमा में आग लगी तो देवीप्रसाद का ऑक्सीजन सिलेंडर हटा दिया गया जिसके बाद उन्हें शताब्दी अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया। सचिन का आरोप है कि देवीप्रसाद की हालत में सुधार था, अगर आग न लगती और ऑक्सीजन सिलेंडर न हटता तो उनकी मौत न होती। 

सुखदीन का आरोप है कि उनके मासूम बेटे की मौत ट्रॉमा में आग लगने के बाद हुई, जबकि डॉक्टरों ने एक स्लिप काटकर उस पर आग लगने से आधे घंटे पहले मौत का समय 6:45 लिख दिया। उसका आरोप है कि ट्रॉमा प्रशासन ने अपनी नाकामी छुपाने के लिए ऐसा किया। सुखदीन का आरोप था कि दस हजार रुपये तो ट्रॉमा के डॉक्टरों और नर्सों ने जांच के नाम पर ले लिए। उसकी कोई रसीद भी नहीं दी। रविवार को भी एक डॉक्टर ने 400 रुपये और नर्स ने 20 रुपये लिए थे।

सुखदीन के मुताबिक सारे पैसे इलाज में खर्च हो गए। वह पोस्टमार्टम हाउस पर दस रुपये का नोट दिखाते हुए बोले कि जेब में सिर्फ यही बचा है। इसके बाद उनके साथ मौजूद लेखपाल इदरीस ने सुखदीन ने 500 रुपये उधार दिए। तब जाकर गुलालाघाट में मासूम का अंतिम संस्कार किया गया। लेखपाल के मुताबिक उन्होंने शासन को 70 हजार रुपये का इस्टीमेट बनाकर भेजा है, जो बहुत जल्द सुखदीन को मिल जाएगा। इसके अतिरिक्त उन्होंने सरकार से अतिरिक्त आर्थिक मदद का भी भरोसा दिलाया। 

सचिन शुक्ला ने बताया कि ट्रॉमा में आग बुझाने के लिए उनका कोई उपकरण काम नहीं कर रहा था। आग लगने के बाद देवीप्रसाद को शताब्दी अस्पताल ले जाते समय रास्ते में मौत हो गई। अस्पताल प्रशासन ने अग्निकांड के दौरान मौत पर पर्दा के लिए देवीप्रसाद की मौत सड़क हादसे में दिखाई और कागज पर सचिन के दस्तखत करवाए। तब शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा।

 

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