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सुप्रीम कोर्ट का वो फैसला जिससे बचेंगी ना जाने कितनी जिंदगियां | नयी दिल्ली


Friday, October 13 2017
Vikram Singh Yadav, Chief Editor ALL INDIA

सुप्रीम कोर्ट का वो फैसला जिससे बचेंगी ना जाने कितनी जिंदगियां

 भारत, तरक्की की राह पर है लेकिन एक सच ये भी है कि सामाजिक मामलों में कई मोर्चों पर देश अभी पीछे है। भारत में बाल विवाह की चुनौती उनमें से एक है। जानकारों के बीच अक्सर ये बहस होती है कि सिर्फ कानून बनाकर हम सामाजिक समस्याओं का सामना नहीं कर सकते हैं। सामाजिक बुराइयों का सामना करने के लिए समाज को ही आगे आने पड़ेगा। इस विषय पर अंतहीन विमर्श जारी रह सकता है। लेकिन बाल विवाह पर लगाम लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट मे बुधवार को ऐतिहासिक फैसला सुनाया। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया कि नाबालिग पत्नी  से संबंध बनाना दुष्कर्म माना जाएगा। इस मुद्दे पर विस्तार से जाने से पहले ये समझना जरूरी है कि दुनिया की कुल बालिका बधुओं (नाबालिग बच्चियों की शादी) में भारत की हिस्सेदारी 33 फीसद है। एक्शन एड इंडिया की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक 18 साल के कम उम्र में शादी कर दिए जाने वाले भारतीयों की संख्या 10.30 करोड़ है। यह संख्या फिलीपींस की कुल आबादी 10 करोड़ और जर्मनी की कुल आबादी 8.07 करोड़ से कहीं ज्यादा है) यदि दुनिया में हर मिनट 28 बालिका बधुएं बनती हैं तो उनमें भारत में शामिल बच्चियों की संख्या 2 है जबकि भारत से  बाल विवाह में धकेली गई बच्चियों की संख्या  8.52 करोड़ है ।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने दूरगामी प्रभाव वाले फैसले में नाबालिग पत्नी से शारीरिक संबंध बनाने को दुष्कर्म करार दे दिया है। कोर्ट ने कहा है कि 18 वर्ष से कम उम्र की लड़की से शारीरिक संबंध बनाना दुष्कर्म है। इससे फर्क नहीं पड़ता कि लड़की शादीशुदा है या नहीं। कोर्ट ने कहा कि 15 से 18 वर्ष की पत्नी के साथ शारीरिक संबंध बनाने को दुष्कर्म की श्रेणी से बाहर रखने वाले आइपीसी की धारा 375 का अपवाद (2) शादीशुदा और गैर शादीशुदा लड़कियों के बीच बेवजह का भेद करता है। यह अंतर बनावटी है और बच्चियों के हित में नहीं है।

ऐसे मामलों में कार्रवाई के लिए सीआरपीसी की धारा 198(6) में दी गई 18 वर्ष से कम आयु की पत्नी से दुष्कर्म पर तय प्रक्रिया का पालन किया जाएगा। इसके मुताबिक पत्नी को घटना के एक साल के भीतर पति के खिलाफ शिकायत करनी होगी। तभी कोर्ट उस शिकायत पर संज्ञान लेगा।

यह व्यवस्था न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर और दीपक गुप्ता की पीठ ने गैरसरकारी संस्था ‘इंडिपेंडेंट थॉट’ की याचिका पर दी है। दोनों न्यायाधीशों ने अलग-अलग फैसला देते हुए एक दूसरे से सहमति जताई है। कोर्ट ने पोक्सो और अन्य बाल कानूनों का आइपीसी के साथ समन्वय बनाते हुए आइपीसी की धारा 375 के अपवाद (2) को नए ढंग से परिभाषित किया है। कोर्ट ने कहा कि आइपीसी के इस अपवाद को अब से ऐसे पढ़ा जाएगा कि ‘अगर कोई व्यक्ति अपनी पत्नी जिसकी उम्र 18 वर्ष से कम नहीं है, शारीरिक संबंध बनाता है तो उसे दुष्कर्म नहीं माना जाएगा।’

कानून में वैसे तो संबंध बनाने के लिए सहमति की उम्र 18 साल है। लेकिन, नाबालिग की सहमति और असहमति का कोई मतलब नहीं होता। उससे संबंध बनाना कानून के लिहाज से दुष्कर्म की श्रेणी में ही आता है। दूसरी तरफ, भारतीय दंड संहिता (आइपीसी) की धारा 375 काअपवाद (2) 15 से लेकर 18 वर्ष की नाबालिग पत्नी से संबंध बनाने को दुष्कर्म की श्रेणी से छूट देता था। सुप्रीम कोर्ट में इसी प्रावधान को चुनौती दी गई थी।

जस्टिस लोकुर ने कहा धारा 375 के अपवाद (2) में किया गया अंतर संविधान के अनुच्छेद 15(3) (महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष उपबंध बनाने का सरकार का हक) और अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार) के खिलाफ है। यह छोटी बच्चियों के शरीर पर हक के भी खिलाफ है। कानून में भेद करते वक्त छोटी बच्चियों की तस्करी से आंखें मूंद ली गईं। सभी को इसे हतोत्साहित करना चाहिए।

जस्टिस गुप्ता ने कहा आइपीसी की धारा 375 का अपवाद (2) निरस्त किए जाने योग्य है, क्योंकि यह संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 का उल्लंघन करता है। यह मनमाना, भेदभाव करने वाला, अतार्किक व बच्चियों के हक का हनन करने वाला है। यह धारा पोक्सो कानून के भी खिलाफ है। फैसला भविष्य से लागू होगा। यानी पूर्व के मामलों में इसका असर नहीं पड़ेगा

जन्म के पहले महीने में होने वाली 27 हजार शिशुओं की मौत को रोकने में मदद मिलेगी।

-55 हजार शिशुओं की मौत रोकी जा सकेगी।

-एक लाख 60 हजार बच्चों को असमय काल-कवलित होने से बचाया जा सकेगा।

-75 फीसद ग्रामीण इलाकों की बाल विवाह में जिम्मेदारी।

देश में होने वाले 70 फीसद कुल बाल विवाह में सात प्रदेशों की हिस्सेदारी( उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, राजस्थान, बिहार, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश शामिल )

वैवाहिक दुष्कर्म यानी बालिग पत्नी से उसकी इच्छा के विरुद्ध जबरदस्ती यौन संबंध बनाने को भारत में अपराध की श्रेणी में नहीं रखा गया है। दुनिया के कई देशों में इसे गंभीर अपराध माना गया है। दुष्कर्म को परिभाषित करने वाली इंडियन पीनल कोड की धारा 375 में वैवाहिक दुष्कर्म को अपवाद की तरह देखा जाता है। इसमें कहा गया
है कि अपनी पत्नी के साथ यौन संबंध बनाने पर यदि पत्नी 15 साल से कम आयु की नहीं है तो दुष्कर्म नहीं माना जाएगा। इसको अपराध कीश्रेणी में न रखे जाने को लेकर सरकार की दलील है कि इससे विवाह नामक संस्था के दरकने का खतरा है।

1976 में ऑस्ट्रेलिया में वैवाहिक दुष्कर्म को अपराध घोषित किया गया। इसके दो दशक पहले ही स्वीडन, नॉर्वे, डेनमार्क, पूर्व सोवियत संघ और चेकोस्लोवाकिया सहित कई देशों ने वैवाहिक दुष्कर्म को अपराध की श्रेणी में ला चुके थे। 1980 के बाद दक्षिण अफ्रीका, आयरलैंड, कनाडा, अमेरिका, न्यूजीलैंड, मलेशिया, घाना और इजरायल जैसे देशों ने वैवाहिक दुष्कर्म के खिलाफ कानून बनाया।

 भारत को यह समझने की जरूरत है कि बाल विवाह मानव अधिकार या लैंगिक मसला मात्र नहीं है। यह व्यापक जनसांख्यिकीय, स्वास्थ्य, शिक्षा और आर्थिक मुद्दा है। यदि हम इस कुप्रथा को खत्म नहीं कर पाते हैं तो बीमार और अकुशल श्रम शक्ति के रूप में यह भारत के विकास की बड़ी बाधा बनने वाली है। यदि आपके पास ज्यादा कुशल श्रमशक्ति होती है तो जीडीपी में केवल उसका ही 1.7 फीसद योगदान अधिक होता है

 

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